Raakh
उन्ही राहों को ढूढ़ते, ना जाने मैं कहाँ बढ़ गया,
ना जाने कैसी तलब थी कि मैं हर पहाड़ चढ़ गया,
अँधेरे के पीछे भागते हुए, एक चिंगारी ही तो लगी थी पैर पर,
पर उसे नज़र अंदाज़ कर, मैं आग में सुलग गया
फिर लम्हों की राख ले कर, आगे मैं चलता रहा,
बीच में रुक, कुछ को चुन, दुबारा बुनता रहा,
पर राख के हर एक ज़र्रे में एक नयी आवाज़ थी,
वो आवाज़ गाती रही और मैं सुनता रहा
कितने दिन बीत गए, कितनी पहर ताक लिए
हर बार गुज़रे हुए वक़्त के आँगन में झाँक लिए
फिर पता चला वो तो अगले ही दिन चल पड़ा था
और मैं बैठे रहा, हाथ में राख लिए ||
Priya
18 Jul, 2011 at 1:58 pm
this is a masterpiece
rajshree
19 Jul, 2011 at 11:03 am
beautiful it is! i knew u could write but this is just awesome